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डर...

कमरे का भारी शीशम का दरवाजा जैसे ही एक हल्की सी चरमराहट के साथ बंद हुआ, अवनि के भीतर का सन्नाटा और गहरा हो गया। अब उस विशाल, फूलों से महकते कमरे में वह पूरी तरह अकेली थी। एकांत के इस पहले ही क्षण ने उसकी छाती में अजीब सी हलचल पैदा कर दी। उसका दिल इतनी तेजी और जोर से धड़क रहा था मानो पसलियों को तोड़कर बाहर आ जाएगा। उसकी हथेलियां, जिन पर पिया के नाम की गहरी शगुन वाली मेहंदी रची थी, पसीने से भीगने लगी थीं। उसने घबराहट में अपनी रेशमी बनारसी साड़ी के पल्लू को अपनी कांपती उंगलियों में कसकर भींच लिया, लेकिन उसकी उंगलियों का कँपकँपाना बंद नहीं हुआ।

यह सिर्फ सामान्य शर्म नहीं थी; यह एक गहरा, अनजाना खौफ और घबराहट थी जो उसके पूरे अस्तित्व को जकड़ रही थी। अपने पच्चीस साल के जीवन में उसने कभी किसी पुरुष के साथ इस तरह एकांत में कमरा साझा नहीं किया था। वह एक ऐसे रूढ़िवादी, संस्कारी परिवार में पली-बढ़ी थी जहाँ लड़कों से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही शालीनता की परिभाषा थी। और आज, अचानक, वह एक ऐसे पुरुष की प्रतीक्षा कर रही थी जो कानूनी और सामाजिक रूप से उसका पति बन चुका था, लेकिन भावनात्मक रूप से अभी भी एक अजनबी ही था।

यह एक पूरी तरह से पारंपरिक अरेंज्ड मैरिज (तयशुदा विवाह) थी। शादी से पहले फोन पर उनकी जो दो-चार बातें हुई भी थीं, उनमें अवनि की तरफ से सिर्फ 'जी', 'हां' या 'हूं' जैसे संक्षिप्त उत्तर ही निकले थे। अपनी बेइंतहा शर्म के कारण वह कभी खुलकर उनसे बात नहीं कर पाई थी, न ही उनके स्वभाव को गहराई से समझ सकी थी। उसे नहीं पता था कि उस भारी शेरवानी और गंभीर चेहरे के पीछे छिपा हुआ इंसान असल में कैसा है। उनकी पसंद क्या है, उनका मिजाज कैसा है, वह कुछ नहीं जानती थी।

जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, अवनि के दिमाग में उसके दोस्तों और शादीशुदा कजीन्स (बहनों) की कही बातें तैरने लगीं। कुछ महीनों पहले उसकी एक सहेली ने अपनी आपबीती सुनाते हुए कहा था, "पुरुषों में सब्र नहीं होता अवनि। पहली रात वे किसी रोमांटिक बातचीत या सहजता का इंतजार नहीं करते, वे सीधे शारीरिक संबंध बनाने पर उतर आते हैं।" एक दूसरी चचेरी बहन की दर्दभरी आवाज उसके कानों में गूंज उठी, जिसने फुसफुसाते हुए आगाह किया था, "पहली बार बहुत दर्द होता है... असहनीय दर्द। बस आंखें बंद करके उस वक्त के गुजरने का इंतजार करना होता है।"

इन यादों ने अवनि की रीढ़ में एक ठंडी सिहरन पैदा कर दी। दर्द की कल्पना और शारीरिक निकटता की यह अनजानी कशमकश उसे भीतर तक डरा रही थी। सबसे बड़ा डर तो उस पल का था जब उसे अपने पति के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र होना पड़ेगा। अपनी देह को, जिसे उसने हमेशा कपड़ों की कई परतों में छुपाकर रखा था, किसी पुरुष की खोजी और अपरिचित नजरों के सामने सौंप देने का विचार ही उसे आत्मग्लानि और संकोच से भर रहा था। वह सोचने लगी—क्या वह सुंदर दिख रही है? क्या उसका शरीर उनके पैमानों पर खरा उतरेगा?

एक और आशंका ने उसके मन में घर कर लिया—'अगर मैं उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो? अगर मैं इस डर में बहकर उनसे दूर भागी और वे मुझसे नाराज हो गए तो?' पुरुषों की अपेक्षाएं क्या होती हैं, इस बात का उसे कोई व्यावहारिक अनुभव नहीं था। वह इस बात से अनजान थी कि वह उन्हें खुश कर पाएगी या अपनी इस घबराहट के कारण पहली ही रात को एक कड़वी याद में बदल देगी।

अवनि ने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढक लिया, घूंघट के भीतर उसकी आँखों के कोरों में डर और असमंजस के दो बूंद आंसू छलक आए। वह फूलों से सजे उस विशाल बिस्तर के एक कोने में सिमट कर बैठ गई, हर बीतते पल के साथ दरवाजे पर होने वाली आहट के डर से उसकी सांसें और भारी होती जा रही थीं।

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