कमरे के बाहर हल्के कदमों की आहट हुई और अवनि का दिल मानो अपनी जगह पर ठहर गया। पीतल की सांकल के हिलने की हल्की सी आवाज के साथ ही वह भारी शीशम का दरवाजा खुला। एक ठंडी, ताजी हवा का झोंका कमरे के अंदर आया, जिसने मोगरे की महक को और हवा दे दी, लेकिन अवनि के शरीर में जैसे बर्फ जम गई। दरवाज़ा बंद होने की हल्की सी 'क्लिक' की आवाज हुई और कुंडी चढ़ा दी गई। कमरे का वातावरण एकाएक बेहद भारी, तनावपूर्ण और एक अजीब सी भीनी मादकता से भर गया। अब इस विशाल कमरे की चारदीवारी के बीच वह और उसका पति, देव, पूरी तरह अकेले थे।
देव ने अपनी शेरवानी के ऊपरी बटन को थोड़ा ढीला किया और गहरे, नपे-तुले कदमों से बेड की तरफ बढ़ने लगा। उसकी हर आहट अवनि की धड़कनों की गति को दोगुना कर रही थी। घूंघट के झीने कपड़े के पार से अवनि को देव के पैरों की परछाईं अपनी ओर बढ़ती हुई साफ दिख रही थी।
बिस्तर के पास आकर देव कुछ पलों के लिए रुका। उसने अपनी गहरी, शांत नजरों से फूलों की चादर के बीच सिमटी हुई अपनी नई नवेली दुल्हन को देखा। कमरे की मद्धम, सुनहरी रोशनी अवनि के लाल जोड़े और उसके गहनों पर पड़कर एक जादुई चमक पैदा कर रही थी।
देव ने बेहद धीमी और मखमली आवाज में अपनी पहली सुरीली दस्तक दी, "नमस्ते, अवनि।"
वह आवाज इतनी गहरी और शालीन थी कि अवनि के कानों में मिश्री सी घुल गई, लेकिन उसके भीतर का डर इतनी आसानी से कम होने वाला नहीं था। देव की मौजूदगी और उसकी पुरुषोचित खुशबू इतनी करीब थी कि अवनि अंदर ही अंदर बुरी तरह छटपटा उठी (squirming). असहजता और संकोच के मारे उसने बेहद सलीके और धीमी गति से, बिना कोई आवाज किए, खुद को बेड के दूसरे कोने की तरफ खिसकाना शुरू कर दिया। वह अनजाने में ही सही, उस शारीरिक निकटता से थोड़ा फासला बनाना चाहती थी।
देव उसकी इस मासूम घबराहट और खिसकने की कोशिश को तुरंत ताड़ गया। उसके चेहरे पर एक बेहद खूबसूरत, समझदार और हल्की सी शरारती मुस्कान उभर आई। वह बिना कोई वक्त गंवाए बिस्तर पर अवनि के बेहद करीब बैठ गया—इतने करीब कि उसकी गर्म सांसें अवनि के घूंघट को छू रही थीं।
इससे पहले कि अवनि और दूर खिसक पाती, देव ने बेहद कोमलता और अधिकार के साथ अपने बड़े, गर्म हाथों को आगे बढ़ाया और अवनि के कांपते हुए, मेहंदी रचे दोनों हाथों को अपने हाथों के घेरे में ले लिया।
"आह!..." देव के उस पहले छुअन के अहसास से अवनि के हलक से एक हल्की सी सिहरन भरी आह निकल गई। उसका पूरा शरीर एक पल के लिए काठ का हो गया। देव के हाथों की गर्माहट सीधे अवनि के कांपते दिल तक पहुंची थी। उसने अपने हाथ छुड़ाने की हल्की सी कोशिश की, लेकिन देव की पकड़ ढीली नहीं हुई; वह बेहद नाजुक लेकिन मजबूत थी।
देव ने अवनि के हाथों को हल्के से सहलाते हुए बेहद दिलकश, मादक और चुलबुले अंदाज में कहा, "अरे बाबा! इतना डर? मुझे तो लगा था कि शादी के बाद विदाई की विलाप सिर्फ मंडप तक होती है, यहाँ कमरे में भी तुम मुझसे दूर भागने की प्लानिंग कर रही हो? वैसे, अगर तुम बेड के उस कोने से नीचे गिर गईं, तो उठाने के लिए भी तुम्हें इसी 'अजनबी' की मदद लेनी पड़ेगी।"
उसकी आवाज में एक ऐसी सेक्सी और दोस्ताना खनक थी जिसने कमरे के भारी तनाव को एक झटके में हल्का कर दिया। अवनि ने घूंघट के पीछे से अपनी भीगी आँखें झपकाईं, उसका डर धीरे-धीरे अचरज में बदल रहा था।
देव थोड़ा और करीब झुका, उसकी आवाज अब और भी रूमानी हो गई थी, "अवनि, अपनी उंगलियों को देखो, ये कैसे थर-थर कांप रही हैं। क्या मैं सचमुच इतना डरावना हूँ? देखो, मैं जानता हूँ कि तुम्हारी सहेलियों या कजीन्स ने तुम्हारे कान में इस रात को लेकर क्या-क्या डरावनी कहानियां फूंकी होंगी। पुरुषों के बारे में जो राय बनाई जाती है, मैं वैसा बिल्कुल नहीं हूँ। मैं यहाँ किसी जल्दबाजी में नहीं हूँ, और न ही मेरा ऐसा कोई इरादा है जिससे तुम्हें तकलीफ हो।"
उसने अवनि के एक हाथ को उठाकर हल्के से अपने होठों से छुआ, जिससे अवनि की रीढ़ में एक नई, मीठी सिहरन दौड़ गई। देव ने बड़ी आत्मीयता से कहा, "आज की रात सिर्फ हमारे एक-दूसरे को जानने की है, बातें करने की है। जब तक तुम पूरी तरह सहज नहीं हो जातीं, मेरी तरफ से तुम पर कोई दबाव नहीं होगा। तुम सिर्फ मेरी पत्नी नहीं हो अवनि, इस जिंदगी के सफर में मेरी सबसे प्यारी दोस्त भी हो। सो, रिलैक्स... अपनी ये प्यारी सी सांसें सामान्य करो, और मुझे भी थोड़ा मौका दो कि मैं अपनी खूबसूरत बीवी का चेहरा देख सकूं।"
देव की इस बेहद संवेदनशील, प्यारी और सांत्वना भरी बातों ने अवनि के दिल पर जैसे ठंडे पानी के छींटे मार दिए थे। उसका वह खौफ कि उसका पति सीधे शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करेगा, हवा में कपूर की तरह उड़ गया। उसकी आंखों के कोने में ठहरा हुआ आंसू अब डर का नहीं, बल्कि एक गहरे सुकून का था।



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