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पहला कदम...

देव की उन मखमली और सांत्वना भरी बातों ने अवनि के भीतर चल रहे तूफ़ान को शांत कर दिया था। उसकी काँपती हुई उँगलियों में अब थोड़ी स्थिरता आ गई थी, हालांकि धड़कनों की रफ़्तार अब भी तेज़ थी—पर इस बार डर से नहीं, बल्कि एक मीठी सी बेकरारी और उत्सुकता से।

देव ने अवनि के हाथों को धीरे से छोड़ा और अपनी उंगलियों को उसके लाल बनारसी साड़ी के सुनहरे बॉर्डर वाले घूंघट पर टिका दिया। कमरे की मद्धम, सुनहरी रोशनी में उन दोनों की परछाईं दीवार पर एक खूबसूरत कोलाज बना रही थी।

"तो... क्या मैं अपनी इस खूबसूरत उलझन को सुलझा सकता हूँ?" देव ने बेहद रूमानी और फुसफुसाती आवाज़ में पूछा।

अवनि ने कोई जवाब नहीं दिया, बस लाज के मारे अपनी आँखें कसकर बंद कर लीं और अपनी गर्दन को थोड़ा और नीचे झुका लिया। उसकी यह खामोश रज़ामंदी देव के लिए काफी थी।

देव ने अवनि के दोनों हाथों को अपने एक हाथ में थाम लिया और दूसरे हाथ की उंगलियों को धीरे-धीरे अवनि के चेहरे के करीब लाया। कमरे की मद्धम, सुनहरी रोशनी में देव की उंगलियों की परछाईं अवनि के रेशमी घूंघट पर पड़ी, तो अवनि की सांसें फिर से कुछ पलों के लिए थम गईं। देव ने अपनी उंगलियों के पोरों से लाल बनारसी साड़ी के किनारों को छुआ और बेहद सलीके, आदर और धीरज के साथ उस झीने घूंघट को धीरे-धीरे ऊपर उठाना शुरू किया।

जैसे-जैसे घूंघट पीछे खिसक रहा था, अवनि का गोरा और कोमल चेहरा धीरे-धीरे चांद की कलाओं की तरह देव के सामने उजागर हो रहा था। भारी मांगटीका, माथे पर लगी लाल कुमकुम की छोटी-छोटी बिंदियां, आंखों में लगा गहरा काजल, और नाक की नथ जो उसके होंठों को छू रही थी—अवनि साक्षात किसी देव-प्रतिमा की तरह सुंदर लग रही थी। लाज के मारे उसकी पलकें कसकर मूंदी हुई थीं और उसके गालों पर आई लाली उसकी खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी।

घूंघट को पूरी तरह पीछे हटाकर जब देव ने अपनी दुल्हन का यह अलौकिक रूप देखा, तो वह पूरी तरह मूक और मंत्रमुग्ध रह गया। कुछ पलों के लिए उसके मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। वह बस एकटक, बिना पलक झपकाए अवनि के इस कातिलाना रूप को निहारता रहा।

अवनि की झुकी हुई लंबी पलकें और उसकी थरथराते होंठ देव के दिल की धड़कनें बढ़ा रहे थे।

"अवनि..." देव की आवाज में एक गहरा सम्मोहन था, "अपनी ये खूबसूरत आँखें खोलो ना। जरा मुझे भी तो देखने दो कि भगवान ने फुर्सत में कितनी नायाब चीज बनाई है। प्लीज, एक बार मेरी तरफ देखो।"

देव की इस आरजू को अवनि टाल नहीं सकी। उसने बेहद संकोच और धीरज के साथ अपनी भारी पलकों को ऊपर उठाया और पहली बार सीधे देव की आँखों में झांका। देव वाकई बेहद आकर्षक था। क्लीन शेव्ड चेहरा, तीखे नैन-नक्श, करीने से संवरे बाल और शेरवानी के भीतर से साफ झलकता उसका सुगठित, कसरती और छरहरा बदन उसकी पुरुषोचित भव्यता को बयां कर रहा था। उसकी आँखों में अवनि के लिए वासना नहीं, बल्कि बेइंतहा आदर और प्यार की चमक थी।

अवनि को खुद को इस तरह निहारते देख देव के चेहरे पर फिर से वही शरारती मुस्कान लौट आई। उसने थोड़ा करीब आते हुए चुटकी ली, "वैसे... मुझे इस तरह एकटक देखना गैर-कानूनी तो नहीं है, पर तुम्हारी इस कातिलाना नजर से मेरी जान जरूर निकल सकती है। अब बताओ, क्या तुम्हारा दूल्हा तुम्हारी उम्मीदों पर खरा उतरा या थोड़ा और हैंडसम होना बाकी है?"

"छी... कुछ भी!" अवनि के मुंह से अचानक बेहद धीमी और सुरीली आवाज में यह शब्द निकला और उसने शरमाकर तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। वह लाज से इस कदर सिमट गई कि अपनी साड़ी के पल्लू से अपना आधा चेहरा छुपाने लगी। उसकी इस अदा पर देव का दिल बाग-बाग हो गया।

उसने अपनी इस घबराहट को छुपाने और माहौल को संभालने के लिए बेहद दबे कदमों से साइड टेबल की तरफ हाथ बढ़ाया और वहां रखा गुनगुने केसर-बादाम के दूध का गिलास उठा लिया। उसने अपनी कांपती हथेलियों से गिलास को दोनों हाथों से पकड़ा और बेहद संकोच के साथ देव की तरफ बढ़ाते हुए धीमी आवाज में कहा, "ये... आपके लिए... माँ जी ने दिया है।"

देव ने गिलास को सीधे पकड़ने के बजाय अवनि की कलाई को हल्के से छुआ, जिससे अवनि के शरीर में एक करंट सा दौड़ गया। देव ने मुस्कुराते हुए कहा, "वाह! आते ही मेरी सेहत की इतनी फिक्र? वैसे, इस दूध के पीछे का राज तो तुम जानती ही हो न? सुना है इससे ताकत आती है... तो क्या मैं समझूं कि तुम मुझे आगे के लिए तैयार कर रही हो?

""आप बहुत बदमाश हैं...", उसका चेहरा अब पूरी तरह गुलाबी हो चुका था।

देव जोर से हंस पड़ा। उसने अवनि की आंखों में आंखें डालकर, बिना नजरें हटाए, उस गिलास से दूध की कुछ घूंट लीं। उसकी गहरी नजरें अवनि के चेहरे के हर उतार-चढ़ाव को पढ़ रही थीं। आधा गिलास खाली करने के बाद देव ने गिलास को रोका और उसे अवनि के होठों के करीब ले आया।

"अब बाकी का आधा मेरी इस खूबसूरत बीवी के लिए। लो, पीयो।"

अवनि ने शर्माते हुए अपनी गर्दन धीरे से हिला दी और मना करते हुए फुसफुसायी, "नहीं... मुझे नहीं पीना, आप ही पी लीजिये।"

"अरे, ऐसे कैसे नहीं पीना? पति का जूठा पीने से प्यार बढ़ता है, सुना नहीं क्या तुमने?" देव ने बेहद मादक और अधिकार भरे लहजे में कहा। उसने अवनि की ठुड्डी को अपनी उंगलियों से हल्के से ऊपर उठाया, जिससे अवनि की निगाहें सीधे देव के चेहरे पर टिक गईं। देव की आँखों में छिपे असीम लाड और रोमांस को देखकर अवनि खुद को रोक नहीं पाई।

देव ने बड़े प्यार से गिलास को अवनि के गुलाबी होठों से छुआया और धीरे-धीरे उसे दूध पिलाने लगा। अवनि ने देव की आंखों में देखते हुए बेहद शर्माते हुए दूध के कुछ घूंट गले से नीचे उतारे। दूध की एक नन्हीं बूंद अवनि के निचले होंठ के कोने पर ठहर गई, जिसे देखकर देव की निगाहें गहरी हो गईं। कमरे का तापमान अब और भी रूमानी और आत्मीय हो चुका था, जहाँ डर की जगह धीरे-धीरे एक खूबसूरत शुरुआत ले रही थी।

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