दूध का गिलास वापस साइड टेबल पर रखने के बाद कमरे की खामोशी एक बार फिर गहरी हो गई, लेकिन इस बार उस खामोशी में डर की जगह एक अजीब सी रूमानी बेचैनी घुली हुई थी। देव ने अवनि की तरफ देखा, उसकी आंखों में शरारत और अपनापन दोनों थे। वह बिस्तर से खड़ा हुआ और उसने सहजता से अपनी भारी मखमली शेरवानी के बाकी बटन खोले। अवनि ने अपनी नीची नजरों के कोने से देखा कि देव ने अपनी शेरवानी उतारकर पास की कुर्सी पर रख दी। इसके बाद, उसने अपनी बनियान भी उतार दी।
रोशनी की मद्धम सुनहरी किरणें देव के सुगठित और छरहरे बदन पर पड़ रही थीं। उसकी चौड़ी छाती, मजबूत कंधे और कसरती पेट (abs) उसकी नियमित जीवनशैली और आकर्षण को बयां कर रहे थे। एक पुरुष की ऐसी गठीली और खुली देह को इतने करीब से देखने का अवनि का यह पहला अनुभव था। लाज के मारे उसकी पलकें एकदम भारी हो गईं और उसने तुरंत अपनी नजरें पूरी तरह फर्श पर टिका दीं। लेकिन देव यहीं नहीं रुका। उसने सहजता से अपने पायजामे की डोरी खोली और उसे भी सरका दिया, जिससे वह अब सिर्फ अपने काले रंग के चुस्त बॉक्सर्स में रह गया।

अवनि ने जब यह महसूस किया, तो उसकी सांसें जैसे गले में ही अटक गईं। उसकी हथेलियां दोबारा पसीने से भीगने लगीं और वह घबराहट में खुद को समेटने लगी। देव ने अपनी दुल्हन की इस चरम घबराहट को भांप लिया। उसने अपनी कमर पर हाथ रखा और बेहद चुलबुले, अधिकार भरे लहजे में हंसते हुए कहा, "अरे बाबा, ऐसे मत डरो। सच कहूं तो मुझे बचपन से ही बॉक्सर्स में सोने की आदत है। अब शादी का मतलब यह तो नहीं कि मैं अपनी सुकून की नींद से समझौता कर लूं, है ना? और वैसे भी, अब हम पति-पत्नी हैं, तो इस रूप की आदत तो तुम्हें डालनी ही पड़ेगी।"
देव वापस बिस्तर पर आया और अवनि के बिल्कुल करीब बैठ गया। उसने अवनि के झुके हुए चेहरे को देखा और बेहद नरमी से कहा, "अवनि, तुम इस भारी-भरकम साड़ी और इतनी सारी भारी ज्वेलरी में कैसे सो पाओगी? रात बहुत हो चुकी है, इन सबको उतार दो और आरामदायक कपड़े पहन लो।"
यह सुनते ही अवनि असमंजस में पड़ गई। वह इस अजनबी के सामने अपनी साड़ी बदलने या गहने उतारने की कल्पना मात्र से कांप उठी। उसकी हिचकिचाहट और उंगलियों की कशमकश देखकर देव के चेहरे पर एक बेहद मादक मुस्कान आ गई। उसने अवनि के कान के पास झुककर अपनी गहरी आवाज में फुसफुसाया, "क्या बात है? बहुत मुश्किल काम लग रहा है? अगर तुम चाहो... तो तुम्हारा यह पति इस नेक काम में तुम्हारी पूरी मदद कर सकता है। बोलो, सेवा का मौका दोगी?"
अवनि ने डरते-डरते, बिना आंखें उठाए बेहद धीमी आवाज में सिर हिलाकर हामी भर दी। उसे लगा कि खुद से इन सारे गहनों को संभालना शायद उसके कांपते हाथों के बस की बात नहीं थी।
देव मुस्कुराया और बड़ी शालीनता से अवनि के बिल्कुल पीछे जाकर बैठ गया। जैसे ही वह पीछे बैठा, देव की चौड़ी, गर्म छाती अवनि की कोमल पीठ से पूरी तरह सट गई। दोनों के शरीरों का यह पहला सीधा स्पर्श था। बनारसी साड़ी के पतले कपड़े के पार से अवनि को देव के जिस्म की तपिश और उसके दिल की धड़कन अपनी पीठ पर साफ महसूस हो रही थी। अवनि की रीढ़ में बिजली का एक करंट सा दौड़ गया।
देव ने सबसे पहले अवनि के सिर पर टिके उस भारी लाल घूंघट की पिनों को एक-एक करके निकालना शुरू किया। जैसे ही आखिरी पिन निकली, घूंघट उसके सिर से सरक कर नीचे गिर गया। इसके बाद देव के हाथों ने अवनि के जूड़े में लगे मोगरे के गजरे और अनगिनत पिनों को ढीला किया। जैसे ही जूड़ा खुला, अवनि के लंबे, रेशमी और काले बाल उसकी पीठ पर बिखर गए, जिनकी खुशबू ने देव को मदहोश कर दिया। देव ने कुछ पिनों को हाथ में लेकर मजाक करते हुए कहा, "बाप रे! इतने सारे सेफ्टी पिन्स? मुझे तो लगता है कि तुम्हारी सहेलियों ने तुम्हें मुझसे बचाने के लिए इस सुरक्षा कवच को तैयार किया था।"
अवनि इस हल्की गुदगुदी पर अपनी हंसी रोक नहीं पाई, लेकिन उसकी घबराहट कम नहीं हुई थी। अब देव के हाथ अवनि के गले और कानों की तरफ बढ़े। उसने अवनि के कानों से सोने के भारी झुमके उतारे। जब देव की उंगलियां झुमके उतारते समय अवनि के संवेदनशील कानों के निचले हिस्से और गर्दन की त्वचा से छुईं, तो अवनि की सांसें बहुत भारी और तेज हो गईं। उसकी छाती तेजी से ऊपर-नीचे होने लगी। देव ने आगे बढ़कर उसके गले का नौलखा हार और मंगलसूत्र के अलावा बाकी सारे भारी हार बड़ी कोमलता से उतारे। उसकी गर्म सांसें अवनि की खुली गर्दन पर पड़ रही थीं, जिससे अवनि का पूरा शरीर सिहर रहा था।
देव ने अवनि के चेहरे के करीब आकर उसकी नाक की नथ की चेन को हटाया और बड़ी नजाकत से नथ को अलग किया। उसका चेहरा अवनि के इतने करीब था कि दोनों की सांसें एक-दूसरे में उलझ रही थीं। अवनि ने अपनी आंखें कसकर बंद कर रखी थीं। इसके बाद देव के हाथ अवनि की पतली कमर पर बंधे सोने के कमरबंद की तरफ गए। जैसे ही देव की उंगलियों ने उसकी कमर की नाजुक त्वचा को छुआ, अवनि के पेट में एक अजीब सा संकुचन हुआ और वह अंदर तक कांप उठी।

अब देव घूमकर अवनि के सामने आया। उसने अवनि के दोनों हाथों को अपने हाथों में लिया। अवनि की कलाई कांच और सोने की भारी चूड़ियों से भरी हुई थी। देव ने एक-एक करके उन चूड़ियों को सरकाना शुरू किया। चूड़ियों की खनक पूरे शांत कमरे में गूंज रही थी। चूड़ियां उतारने के बाद देव ने अवनि की हथेलियों को फैलाया। उसने अवनि की लंबी, पतली और नाजुक उंगलियों (slender fragile fingers) को निहारा, जो इस वक्त भी बुरी तरह कांप रही थीं।
"तुम्हारे हाथ कितने नाजुक और खूबसूरत हैं अवनि..." देव ने बेहद रूमानी आवाज में कहा और अवनि की कांपती उंगलियों को उठाकर अपनी आंखों से लगाया, और फिर एक-एक करके उसकी उंगलियों के पोरों पर अपने होठों से गहरे, कामुक चुंबन अंकित करने लगा। अवनि की हथेलियों पर देव के होठों का वह गीला अहसास उसे एक अलग ही दुनिया में ले जा रहा था। देव ने चुंबन लेते हुए बेहद मादक नजरों से अवनि को देखा और एक छुपे हुए अर्थ के साथ कहा, "ये उंगलियां आज इतनी कांप रही हैं... पर मुझे यकीन है कि बहुत जल्द ये इसी तरह कांपते हुए मुझे और करीब खींचेंगी।" अवनि का पूरा चेहरा इस गहरे इशारे से शर्म के मारे तवे जैसा लाल हो गया।
इसके बाद, देव बिस्तर से नीचे फर्श पर अवनि के पैरों के पास घुटनों के बल बैठ गया। जैसे ही उसने अवनि के पैरों की तरफ हाथ बढ़ाया, अवनि सकपका गई। भारतीय संस्कृति में पति को भगवान माना जाता है, इसलिए वह अपने पैर देव को छूने नहीं देना चाहती थी। उसने घबराकर अपने पैर पीछे खींचने की कोशिश की और बेहद तीखी, धीमी आवाज में कहा, "नहीं... प्लीज, आप मेरे पैर मत छुइए... ये पाप है।"
देव ने अवनि के इस संकोच पर एक बेहद प्यारी और गहरी निगाह डाली। उसने अवनि के पैरों को टखनों (ankles) से मजबूती और लाड से पकड़ लिया ताकि वह उन्हें पीछे न खींच सके। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "श्रीमती अवनि देव राजवंशी, मैं कोई भी काम अधूरा नहीं छोड़ता। और जब बात मेरी बीवी को आराम पहुंचाने की हो, तो पाप-पुण्य के नियम बदल जाते हैं।"
देव ने बड़ी नजाकत से अवनि के पैरों में बंधी चांदी की भारी पाजेब के घुंघरुओं को खोला और उन्हें अलग रख दिया। पाजेब उतारने के बाद भी देव ने उसके पैरों को नहीं छोड़ा। उसने अपने दोनों बड़े हाथों से अवनि के आलता से रंगे हुए लाल पैरों को बेहद प्यार से सहलाया । आलता की वो सुर्खी और बिछियों की चमक देव के दिल को छू गई थी। उसने अवनि के पैर के अंगूठे को हल्के से दबाते हुए बेहद दीवानगी भरे लहजे में कहा, "तुम्हारे ये पैर आलता में कितने कयामत लग रहे हैं। मेरी एक बात मानोगी? तुम हर रोज अपने पैरों में इसी तरह आलता लगाया करो... तुम्हारी ये लाल मांग और ये लाल पैर, मुझे हमेशा याद दिलाएंगे कि तुम सिर्फ और सिर्फ मेरी हो।"

देव की इस बेइंतहा मोहब्बत, परवाह और रूमानी अंदाज ने अवनि के भीतर के बचे-खुचे डर को भी पूरी तरह पिघला दिया था। वह अब सिर्फ लाज और अपने पति के असीम लाड के सागर में डूब रही थी।


Write a comment ...